बुधवार, 14 सितंबर 2011

नवांकुरण

निस्तब्ध रात्रि की नीरवता में
फलदायी चुम्बन शृंखलाओ से
होते रहे स्पंदित
एक दूसरे की आंच में धीमे धीमे आग की तरह सुलगते हुए अरमान
मौन
रात्रि के तीसरे पहर का मौन
और ...
उह मौन को चीरती हुई आवाजें
मेरे और तुम्हारे उखरे हुए सांसो की
वेदना कुछ तुम्हे भी
कुछ मुझे भी
और होता है समर
समर आंतरिक भावों का
जिस में हो जाती है मेरी पराजय
आनंद के अतिरेक पर मेरी पराजय
और
उस परजयोपरांत होता है
तुम्हारे बगीचे में मेरे द्वारा
नई फसल के नए बीज का
नवांकुरण

1 टिप्पणी:

  1. आहा बीजू भाई, क्या जबरदस्त काव्य प्रस्फुटन हुआ है. अति सुन्दर. ऐसे ही लिखते रहें . शुभकामनायें.

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