मंगलवार, 13 सितंबर 2011

प्यार का बैंकिंग

तुम भी
रोज़ आती थी मेरे
जिम्मेदारिओं के काउंटर पर
आए दिन हल्ला मचाने वाले
ग्राहकों की तरह
खोल लिया अकाउंट
मेरे दिल में भी
और
करने लगी काउंट
धरकनो के उतार चढ़ाव को
किसी पासबुक में लगातार
चेंज होने वाले
बैलेंस की तरह
चेंज होती रही
तुम्हारे प्यार की अनुभूति भी
कभी दिल के बहुत करीब
धरकनो को सकून देती हुई
तो कभी
जज्बातों में
बगावत का उफान लाती हुई
फिर एक दिन
तुम चली गयी उसके साथ
दुसरे के खाते में लगे
इनवार्ड क्लियरिंग के चेक में
लिखे भरी भरकम अमौन्ट की तरह
और मैं
मजबूर देखता रहा
तुम्हे जाते हुए
आज मैं फिर निकल परा हूँ
बिजनेस बढाने
एक नए
कस्टमर की तलाश में .


विजय वर्धन

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