एक चौअन्नी थी .....
बरी प्यारी सी ... मिलती थी हफ्ते में दो बार
जब गाँव में हाट लगता था .....................
शायद उस ज़माने के दुसरे बच्चों की तरह
मेरी भी कमाई थी वो .....
उसे लेकर अगले दो दिनोतक
शहंशाह बना फिरता ...........
मेरी उम्र के बच्चों में
कभी ऊपर वाली जेब में
बरी प्यारी सी ... मिलती थी हफ्ते में दो बार
जब गाँव में हाट लगता था .....................
शायद उस ज़माने के दुसरे बच्चों की तरह
मेरी भी कमाई थी वो .....
उसे लेकर अगले दो दिनोतक
शहंशाह बना फिरता ...........
मेरी उम्र के बच्चों में
कभी ऊपर वाली जेब में
कभी पीछे की जेब में
तो फिर पेंट की उस जेब में जहाँ
एक छोटा सा छेद हुआ करता था
इस संशय के साथ रखता था उसे
के गिर न जाये ........ परेशानी थी
एक चौअन्नी थी .............................. ....
आज सेलेरी है ..............
एक लाख से ज्यादा चौअन्नीयों की ....
मगर
चौअन्नी नहीं है ...... और न ही
वो राजशाही जो उन चौअंनीयो में थी .......
अब तमाशा है ...... जिंदगी का
खेल .... परेशानियों की लुका छिप्पी का
मगर ...........
मगर ..................
मगर .............................
तो फिर पेंट की उस जेब में जहाँ
एक छोटा सा छेद हुआ करता था
इस संशय के साथ रखता था उसे
के गिर न जाये ........ परेशानी थी
एक चौअन्नी थी ..............................
आज सेलेरी है ..............
एक लाख से ज्यादा चौअन्नीयों की ....
मगर
चौअन्नी नहीं है ...... और न ही
वो राजशाही जो उन चौअंनीयो में थी .......
अब तमाशा है ...... जिंदगी का
खेल .... परेशानियों की लुका छिप्पी का
मगर ...........
मगर ..................
मगर .............................