गुरुवार, 22 नवंबर 2012

सुना है !......
बहुत दर्द होता है
सर्दी के महीनों में
उन चोटों का ....इंसान
जिसकी दवा न ले ........
शायद इसी ख्याल से थर्रा
उठी है रूह
मैंने डाक्टर से नहीं दिखाया
वेवफा तुमने
जहाँ जहाँ ..........चूमा था मुझे ..................
श्री मुर्गा जी की आरती
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जय जय जय मुर्गा ,
जय जय जय मुर्गा ,
तेरे कारण मन में ,उपजी ये दुविधा
करे तुम्हारा भोजन या व्रत रखे दुर्गा
जय जय जय मुर्गा , जय जय जय मुर्गा
.
.
तुम हो पीले - काले , तुम सफेद तुम स्लेट
मुर्गा तुम सफ़ेद तुम स्लेट
तेरे कारण सजता , मुर्गा तेरे कारण सजता
है गेस्ट का प्लेट
जय जय जय मुर्गा , जय जय जय मुर्गा
.
.
बाएँ तरफ शोभे मुर्गी , दाएँ तरफ अंडा
मुर्गा ,दाएं तरफ अंडा
तुझे न लाऊं घर तो , दे बीबी डंडा
जय जय जय मुर्गा ,जय जय जय मुर्गा
.
.
श्री मुर्गा जी के टांग को , जो कोई नर खावे ,
मुर्गा जो कोई नर खावे ,
पाए टेस्ट अलौकिक , मन में इतरावे
जय जय जय मुर्गा , जय जय जय मुर्गा
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विजय वर्धन ( सप्तमी २०१२)
इन खेतों में धान लगे है
खेत जो दोनों ओर बिछे हैं
उस रस्ते पर , रोज जिधर से
बैंक सबेरे जाता हूँ
मेरे गाँव के खेतों में भी
ऐसा ही कुछ धान उगा है
उन खेतों की सौंधी खुशबू
इन खेतों के जैसी ही है
.
वह बूढा जो रोज सवेरे
मेरे ब्रांच के काउंटर पर
बैलेंस पूछने आता है
अपने चेहरे की झुर्रियों से
धंसी धंसी बूढ़ी आँखों से
बिन बोले ही हम सब से जो
सवाल कई कर जाता है
उस बूढ़े की लाचारी भी
मिलती है मेरे गांव के
अपनों से बिछरे बूढ़े से
.
मेरे गांव के मंदिर पर
है इक कुआं ,है इक पोखर
उस कुँए का पानी मीठा
मन की प्यास बुझाता है जो
उतना ही मीठा है पानी
उस रस्ते के हर कुँए का
जिस रस्ते से रोज सबेरे
ड्यूटी करने जाता हूँ मैं
.
पेड़ जो दोनों ओर खरे हैं
बाहों को पूरा फैलाए
मेरे स्वागत में हर सुबह
ताजी ताजी हवा बहाए
जिन पेड़ों के छांह में खेला
जिनके फल को खाकर फैला
उनकी हवा सी ही शीतल है
इन पेड़ों की मस्त हवाएं
.
जब खेत ने अपना महक न बदला
जल ने मत बदली शीतलता
हवाएं भी बिलकुल इक जैसी
बराबर बूढों की आकुलता
फिर क्यों यहाँ के लोगों
को लगता है मेरा हर इक चीज पराया
मेरी सेवा के हर पहलू
क्यों इनके मन में न समाया
क्यों इनके मन में न समाया

रविवार, 22 जुलाई 2012

अजनबी लोगों में ,
हर चेहरे पर तुम्हे तलाशने की कोशिश
शायद के कहीं मिल जाओ तुम ,
धरका दो मेरे दिल के तार को
इश्क के रूमानी ज़ज्बातों से
फिर किसी नदी की तरह
बहने लगो मेरे अंदर
और मुझे मुझी से बहाकर ले जाओ कही दूर
काश मिल जाओ मुझे
इस अजनबी शहर में .................
हाँ ...मैंने तुमसे मुहब्बत किया था ,
तुम्हारी अदाओं पर मिटा था ,
तुम्हारे सपने देखे थे
उन सपनो को नई दिशा देने के लिए
अपने अरमानो के कैनवास पर
जिंदगी के रंग भरनी चाही थी ,
मगर .....
तुम्हारी उन्मत्त आकांक्षाओ ने
मेरे कोमल सपनो को
कच्ची नींद से जगाकर
तोड़ दिया ..............
और मैं एक बार फिर कोशिश में लगा हूँ
सोने की ..........
एक नए सपने देखने की
बस एक इल्तजा है .......
मेरी नींद मत तोडना ...............


गुरुवार, 8 मार्च 2012

चैत

ठक ठक .....
दस्तक दरवाजे पर ....
फिर कोई रंग लगाने आगया ....?
या कोई बेउरा नशे मे गलत दरवाजा पीट रहा होगा ,
आँखे मीचता ..सहमा सा खोल दिया मैंने दर को ...

सामने चैत था ...रूखा सा बेरंग ....
अपनी धूल भरी हवाएं लेकर ...
उदर विकार लेकर ... और ..
शिकायतें लेकर .....साथ मे
दिखा रहा था एक डिस्क्लेमर ...
फागुन मे होली मे उल्टा सीधा खा कर
अपनी बदहजमी को
मेरे ऊपर मत लादना ...
मैं भी फागुन और सावन की तरह
एक मौसम हूँ ..
तुम जैसे कवियों ने ..
वासनामई कलम से सावन मे नाइका के
मदमस्त रूप को तो लिखा
वसंत मे प्रेम से सरावोर उनकी किस्मत को तो लिखा
लेकिन प्रेम के सबसे निराले रंग
विरह के मुझ चैत पर स्याही खर्च नहीं की ...
देख अब मैं अपने रंग दिखाउंगा ..
दुल्हनो को बिरहन बनाऊंगा ..
चैत ....तुम्हारी शिकायत हां कवियों से है ..
हमें सजा दो ...
मुहब्बत पे डाका मत डारो
मिलन को विरह मे मत बदलो ..
इश्क के सौंदर्य को बढाओ ..
सौंदर्य ? हाँ कवि तुम्हे क्या पता
बिरह के बाद के प्रेम की अनुभूति
तुमने मुझे सोचा नहीं ....मुदा ...
मैं ...
तुम्हारी कविताओं का कारण हूँ ...
चैत शायद ठीक कह रहा था ...!