ठक ठक .....
दस्तक दरवाजे पर ....
फिर कोई रंग लगाने आगया ....?
या कोई बेउरा नशे मे गलत दरवाजा पीट रहा होगा ,
आँखे मीचता ..सहमा सा खोल दिया मैंने दर को ...
सामने चैत था ...रूखा सा बेरंग ....
अपनी धूल भरी हवाएं लेकर ...
उदर विकार लेकर ... और ..
शिकायतें लेकर .....साथ मे
दिखा रहा था एक डिस्क्लेमर ...
फागुन मे होली मे उल्टा सीधा खा कर
अपनी बदहजमी को
मेरे ऊपर मत लादना ...
मैं भी फागुन और सावन की तरह
एक मौसम हूँ ..
तुम जैसे कवियों ने ..
वासनामई कलम से सावन मे नाइका के
मदमस्त रूप को तो लिखा
वसंत मे प्रेम से सरावोर उनकी किस्मत को तो लिखा
लेकिन प्रेम के सबसे निराले रंग
विरह के मुझ चैत पर स्याही खर्च नहीं की ...
देख अब मैं अपने रंग दिखाउंगा ..
दुल्हनो को बिरहन बनाऊंगा ..
चैत ....तुम्हारी शिकायत हां कवियों से है ..
हमें सजा दो ...
मुहब्बत पे डाका मत डारो
मिलन को विरह मे मत बदलो ..
इश्क के सौंदर्य को बढाओ ..
सौंदर्य ? हाँ कवि तुम्हे क्या पता
बिरह के बाद के प्रेम की अनुभूति
तुमने मुझे सोचा नहीं ....मुदा ...
मैं ...
तुम्हारी कविताओं का कारण हूँ ...
चैत शायद ठीक कह रहा था ...!
दस्तक दरवाजे पर ....
फिर कोई रंग लगाने आगया ....?
या कोई बेउरा नशे मे गलत दरवाजा पीट रहा होगा ,
आँखे मीचता ..सहमा सा खोल दिया मैंने दर को ...
सामने चैत था ...रूखा सा बेरंग ....
अपनी धूल भरी हवाएं लेकर ...
उदर विकार लेकर ... और ..
शिकायतें लेकर .....साथ मे
दिखा रहा था एक डिस्क्लेमर ...
फागुन मे होली मे उल्टा सीधा खा कर
अपनी बदहजमी को
मेरे ऊपर मत लादना ...
मैं भी फागुन और सावन की तरह
एक मौसम हूँ ..
तुम जैसे कवियों ने ..
वासनामई कलम से सावन मे नाइका के
मदमस्त रूप को तो लिखा
वसंत मे प्रेम से सरावोर उनकी किस्मत को तो लिखा
लेकिन प्रेम के सबसे निराले रंग
विरह के मुझ चैत पर स्याही खर्च नहीं की ...
देख अब मैं अपने रंग दिखाउंगा ..
दुल्हनो को बिरहन बनाऊंगा ..
चैत ....तुम्हारी शिकायत हां कवियों से है ..
हमें सजा दो ...
मुहब्बत पे डाका मत डारो
मिलन को विरह मे मत बदलो ..
इश्क के सौंदर्य को बढाओ ..
सौंदर्य ? हाँ कवि तुम्हे क्या पता
बिरह के बाद के प्रेम की अनुभूति
तुमने मुझे सोचा नहीं ....मुदा ...
मैं ...
तुम्हारी कविताओं का कारण हूँ ...
चैत शायद ठीक कह रहा था ...!