रविवार, 12 फ़रवरी 2012

वसंत





वसंत तुम फिर आ गए ?
मुझे मेरी विवशता का अहसास दिलाने ,
तितलियाँ कभी उड़ा करती थी
उन मेडो पर जहाँ
गेहूं की बल्लियों के बीच
सरसों के फूलों पे वो
बैठ जाती थी ,और मैं
दबे पांव उसके पीछे उसे पकडने आता था ,
महक आम मंजरियों की जो मेरे
नाक तक पहुचा करती थी और
देर शाम हल्की हल्की हवाएं और दूर कहीं
फाग गाते किसी विरहे का दर्द
उफ़ उस दर्द का आनंद याद दिलाने
मेरे हालात का मजाक उड़ने तुम फिर आ गए
वसंत तुम फिर आ गए ?
क्यों आते हो तुम जबकि तुमको भी ये खबर है
कि मैं जिंदगी की ज़द्दोज़हद में कहीं दूर जा चुका हूँ
अब रोटी की लड़ाई में गेहूं याद नहीं आता
फूल हाँ , शायद कभी देखा था जिसे
अखबार के तीसरे पन्ने पर
और तितलियाँ शायद पैसा बन गयी है
लाख कोशिश कर लो पकड़ में नहीं आती
कोलावारी के गीत , अंतर्मन के द्वंद्व का हल नहीं निकाल पाते
फिर बसंत तुम क्यों न दबे पाँव चले जाते हो?
क्यों इतना सताते हो ?
वसंत तुम क्यों आते हो ?

प्यार का एन पी ए





वो पिछले अक्टूबर की ,
एक शाम थी , जब
मैंने खोली अपनी दुकान थी
आज नगद कल उधार
इसी फलसफे से शुरू किया
मैंने अपना व्यापार ,
बहुत प्यारी तुम्हारी वो मुस्कान थी
क्योंकि तुम ग्राहक नहीं
मेरे लिए भगवान थी ,
तुम्हारी अदाओं ने किया मेरे मन पर असर
और तुम बन गयी , उधार की कस्टमर
मास नवंबर का था बीत रहा ,
तेरे इश्क में मेरा दिल था रीत रहा किन्तु
तुमने नहीं दिया किसी तरह के इमोशन
का सिग्नल ,
टूट गया मेरे ह्रदय का एक टर्मिनल,
मगर मेरे मन ने दी मुझको एक नई शिक्षा
कर लो बाबू दिसंबर तक प्रतीक्षा
हो जाता था मेरा दिल सन्न
जब रात की घंटी बजती थी टन
मगर नहीं आया तुम्हारा कोई मेसेज ,
जिसके लिए मैंने कभी नहीं छोरा कवरेज
और फिर आ गया नया साल
तेरे जबाब की प्रतीक्षा में हो गया बुरा हाल,
अब बहानो के एसएमएस भी करने लगा था
तुमसे जबाब के लिए मैं मरने लगा था
दिल छुट्टियों में भे लगाते रहा तेरे इश्क के फेरे
कि कहीं कह दो तुम की आप हो मेरे
देखते ही देखते बीत गयी जनवरी
हर तरफ हो रही है मेरी किरकिरी
क्यों दिया मैंने तुम्हे अपना दिल उधार
के एन पी ए हो गया मेरे इश्क का व्यापार !!