रविवार, 18 सितंबर 2011

अभी सोचा नहीं

स रोज़ तुम्हे देखा था
अंतिम बार
जब उसके साथ चली गयी थी
मेरे अरमानो का गला घोटकर
लेकिन तुम्हे यह पता नहीं था
के मेरे अरमान मरे नहीं थे
उसने तेरी बेवफाई के सामने
महज़ एक ढोंग रचा था
तेरे खिलवार के नाटक को
मेरी भावनाओं पर कहर ढाने
से
बचाने के लिए
उसने अपनी बलि देने की ढोंग करी थी
तुम जानती हो  अरमान मरते नहीं
रंग बदलते हैं
तुम्हारी झूठी मुहब्बत की तरह
उसने भी रंग बदला
किसी  और के चेहरे पर
तुम्हारी  अदाओं का तिरस्कार करते हुए
मोहित होने की
चेष्टा की
तुम्हे भुलाने के लिए
हर वो स्वांग रचा जिससे मेरे दिल को तसल्ली हो
लेकिन मिटा न सका
तुम्हारे लिए मेरे दिल में पनपे चाहत को
और मैं अब भी कर रहा हूँ इंतज़ार
एक तुम्हारे लौट आने का .

हालात

पहले
कोई फेक देता था
सूखती हुई टहनी भी
तो बिना भावनाओं से सींचे
और
बिश्वास के पोषण के
 अभाव में भी बन जाता था एक दरख़्त
थी जमीन दिल की उतनी उर्वर
अब
बिश्वास में डुबोकर
भावनाओं से सींच कर भी
नहीं फूट रहा कोई
प्रेम का अंकुर
दिल की जमीन है इतनी बंज़र

शनिवार, 17 सितंबर 2011

नव तरु की नूतन छाया से
वह नव तरुणा  जब गई बैठ कर
उस तरुणा का तब से अब तक
बाट जोहता है वह तरुवर

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

इश्क

वो उनकी मुहब्बत का असर था
या मिली थी मेरे ख्वाबों को तामील
हम भी लुटे थे इश्क में
फरहाद की तरह

आग

वो शमा जो जलती थी तेरे सहारे कलतक
सुना है उसने आज तेरा ही दामन जला दिया

रोग

इश्क नाकाम करती है
यह सुना था मैने
आज करके देखा तो ये जाना
मेरे कानो मे कोई बिमारी नही !

मौसम

वो रात नहीं मेरे प्यार का सबेरा था
जब तेरी जुल्फों में मेरा बसेरा था
अपने इश्क से हो गयी रौशन
जिन गलिओं में कल तलक अँधेरा था
 

सैलाब

पहले
जिश्मों के आंच पर
पिघल जाते थे मुहब्बत के बर्फ
और फिर हर तरफ
तबाही के सैलाब का मंज़र नज़र आता था
अब
मोहब्बत के सैलाब में भी
जब नहीं बुझती
जिश्मों की आग
समझ लो  वो सैलाब नहीं
नुक्कर के सरकारी  हैंडपंप का
बिन रुका बहाव है

बुधवार, 14 सितंबर 2011

तस्वीर

दिल के रंग से
जज्बातों के कूचों ने
अरमानों के कैनवास पर
खीची कुछ तिरछी रेखाएं
धुंधली सी तस्वीर जो उभरी
शायद तुम्हारी ही  थी



नवांकुरण

निस्तब्ध रात्रि की नीरवता में
फलदायी चुम्बन शृंखलाओ से
होते रहे स्पंदित
एक दूसरे की आंच में धीमे धीमे आग की तरह सुलगते हुए अरमान
मौन
रात्रि के तीसरे पहर का मौन
और ...
उह मौन को चीरती हुई आवाजें
मेरे और तुम्हारे उखरे हुए सांसो की
वेदना कुछ तुम्हे भी
कुछ मुझे भी
और होता है समर
समर आंतरिक भावों का
जिस में हो जाती है मेरी पराजय
आनंद के अतिरेक पर मेरी पराजय
और
उस परजयोपरांत होता है
तुम्हारे बगीचे में मेरे द्वारा
नई फसल के नए बीज का
नवांकुरण

आज का अर्जुन

भ्रष्टों की पूरी फ़ौज में यहाँ कोई बिदुर कहाँ
ढूंढो अगर !हर शख्स में शकुनि ही पाओगे यहाँ
हर पेट लाक्षागृह बना खुद की अगन में जल गया है
इस महा भारत का अर्जुन किन बनों में खो गया है
सौप कर सत्ता सुयोधन धृतराष्ट्र देखो सो गया है?
हर तरफ देखो यहाँ है चक्रव्यूह अत्याचार का
भय भूख का आतंक का जुर्म अनाचार का
है लुट रही पांचालियाँ केशव कहीं पर सो गया है
इस महा भारत...

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

प्यार का बैंकिंग

तुम भी
रोज़ आती थी मेरे
जिम्मेदारिओं के काउंटर पर
आए दिन हल्ला मचाने वाले
ग्राहकों की तरह
खोल लिया अकाउंट
मेरे दिल में भी
और
करने लगी काउंट
धरकनो के उतार चढ़ाव को
किसी पासबुक में लगातार
चेंज होने वाले
बैलेंस की तरह
चेंज होती रही
तुम्हारे प्यार की अनुभूति भी
कभी दिल के बहुत करीब
धरकनो को सकून देती हुई
तो कभी
जज्बातों में
बगावत का उफान लाती हुई
फिर एक दिन
तुम चली गयी उसके साथ
दुसरे के खाते में लगे
इनवार्ड क्लियरिंग के चेक में
लिखे भरी भरकम अमौन्ट की तरह
और मैं
मजबूर देखता रहा
तुम्हे जाते हुए
आज मैं फिर निकल परा हूँ
बिजनेस बढाने
एक नए
कस्टमर की तलाश में .


विजय वर्धन